Pratidin Ek Kavita

छोटी-छोटी इच्छाएँ | बद्री नारायण 

मैं रात-दिन 
स्मरण करता हूँ 
अपनी उन छोटी इच्छाओं का 
जो पूरी हो गईं 
धीरे-धीरे 

जिन छोटी-छोटी इच्छाओं के चक्कर में 
अपनी बड़ी इच्छाओं से किनारा किया 
धिक्कार है मुझे 
कि मेरी धरी की धरी रह गई 
पहाड़ तोड़ने की इच्छा! 

काग़ज़ की नाव बनाकर 
मान लिया कि 
पूरी कर ली 
बड़ी-बड़ी लहरों से भरे समुद्र लांघने की इच्छा 

कुछ कविता लिखकर 
मैंने साध ली है 
प्रतिरोध करने की इच्छा 
धिक्कार है मुझे 
मेरी छोटी इच्छाओं को 
और उन्हें पूरा करने वालों को।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।