Pratidin Ek Kavita

सपने -  विश्वनाथ प्रसाद तिवारी

कैसे कटती हैं उनकी रातें
जो सपने नहीं देखते?
सपने आकाश की तरह अनंत
सपने क्षितिज की तरह अजनबी
सपने बच्चों की तरह मुलायम
सपने परियों की तरह पंख फैलाए
सपने कोहरे में सोए जंगलों की तरह
उगते दिन की तरह सपने
कहते हैं वे
अपने सपने बेच दो
क्या खरीदूँगा मैं
अपने सपने बेचकर?

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।