Pratidin Ek Kavita

कत्थई गुलाब - शमशेर बहादुर सिंह

कत्थई गुलाब 
दबाए हुए हैं 
नर्म नर्म 
केसरिया साँवलापन मानो 
शाम की 
अंगूरी रेशम की झलक, 
कोमल 
कोहरिल 
बिजलियाँ-सी 
लहराए हुए हैं 
आकाशीय 
गंगा की 
झिलमिली ओढ़े 
तुम्हारे 
तन का छंद 
गतस्पर्श 
अति अति अति नवीन आशाओं भरा 
तुम्हारा 
बंद बंद 
“ये लहरें घेर लेती हैं 
ये लहरें... 
उभरकर अर्द्धद्वितीया 
टूट जाता है...” 
किसका होगा यह पद 
किस कवि-मन का 
किस सरि-तट पर सुना? 
ओ प्रेम की 
असंभव सरलते 
सदैव सदैव! 

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।