जो शिलाएँ तोड़ते हैं । केदारनाथ अग्रवाल ज़िंदगी को वह गढ़ेंगे जो शिलाएँ तोड़ते हैं, जो भगीरथ नीर की निर्भय शिराएँ मोड़ते हैं। यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!! ज़िंदगी को वे गढ़ेंगे जो खदानें खोदते हैं, लौह के सोए असुर को कर्म-रथ में जोतते हैं। यज्ञ को इस शक्ति श्रम के श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!! ज़िंदगी को वे गढ़ेंगे जो प्रभंजन हाँकते हैं, शूरवीरों के चरण से रक्त-रेखा आँकते हैं। यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!! ज़िंदगी को वे गढ़ेंगे जो प्रलय को रोकते हैं, रक्त से रंजित धरा पर शांति का पथ खोजते हैं। यज्ञ को इस शक्ति-श्रम के श्रेष्ठतम् मैं मानता हूँ!! मैं नया इंसान हूँ इस यज्ञ में सहयोग दूँगा। ख़ूबसूरत ज़िंदगी की नौजवानी भोग लूँगा।