Pratidin Ek Kavita

सदी संवाद | सूर्यबाला

आधी सदी पहले-
वह मेरा छुटंका देवर
रसोई के दरवाजे पर डंका सा पीटता था-
कि उसे स्कूल की देरी हो रही है 
और बाइस की मैं-
सहमी, सकपकाई-
चूल्हे से फूली गरम रोटियां निकाल
उसकी थाली में सरकाती थी
और फिर नल की धार में 
भाप से जली अपनी उँगलियाँ 
ठंडाती थी-
छज्जे से देखता मेरा पति,
मन ही मन आश्वस्त हो लेता था
कि यह स्त्री, उसका कुटुंब संभाल ली जा रही है
आधी सदी बाद -
 खिचड़ाए बालों वाला वह मेरा अधेड़ देवर 
अब मेरे पैरों को इस तरह छूता है कि-
उन्हें मंदिर की देहरी बना देता है ।....
और
जूते के तस्में बांधता मेरा पति 
रूंधे गले से सोचता है-
‘यह भाई’ ‘इस स्त्री’ की संभाल कर ले जाएगा......

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।