Pratidin Ek Kavita

कविता सी रची माँ - सूर्यबाला 

सुनो, मुझे समय का 
सिर्फ एक पृष्ठ सहज लेने दो 
जिस पर कविता सी रची है मेरी माँ 
वह पृष्ठ फड़फड़ाता है 
जो किसी ऊँची डाल से हरसिंगार चढ़ती 
लोरी के बूंदों की तरह 
और खो सी जाती हूँ
सोन चिड़िया सी मै
वह पृष्ठ, ऊँची डाल और वे लोरी के बोल 
नहीं सहेजे गए न ,
तो लोरियां कहाँ आकर गाएंगी?
और ऋतुएं कहाँ से सुनाएंगी ?
वन पाखी सी !
तो सुनो, मुझे समय का 
सिर्फ एक पृष्ठ सहज लेने दो 

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।