Pratidin Ek Kavita

पोस्टकार्ड | रामदरश मिश्र 
 
चिट्ठी तो मैं भी हूँ
 परंतु वह सभ्य क़ीमती लिफ़ाफ़ा नहीं
 जो अपने भीतर 
न जाने क्या-क्या छिपाये रहता है 
और उसे दुनिया की नज़रों से बचाकर 
छोड़ आता है किसी हाथ के एकांत में
 मैं तो खुला हुआ सस्ता-सा पोस्टकार्ड हूँ 
और ढोता रहता हूँ
 मोटी खुरदरी अँगुलियों के सुख-दुख 
जिन्हें यहाँ-वहाँ कोई भी बाँच सकता है
और स्पंदित होकर महसूस कर सकता है कि
अरे यह चिट्ठी तो उसी की है
लेटरबक्स में जब लिफ़ाफ़े 
एक-दूसरे से मुँह फेरे 
अपने में बन्द पड़े होते हैं 
तब हम पोस्टकार्ड एक-दूसरे से बतियाते रहते हैं
 आते-जाते रहते हैं एक-दूसरे में 
और हर एक को लगता है कि
 वह अकेला न रहकर चिट्ठियों का कारवाँ बन गया है।
 

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।