Pratidin Ek Kavita

हम अपना बीतना देखते हैं - यश मालवीय

कल पर उड़ती नज़र फेंकते हैं 
हम अपना बीतना देखते हैं 
अपने से ही अनबन मगर तक़ाज़े हैं 
सपने खुले-खुले, जकड़े दरवाज़े हैं 
चलते-चलते बीच रास्ते में 
अपना ही रास्ता छेंकते हैं 
सुबहों के कुहरे को झीना करने की 
तारीख़ों को भीना-भीना करने की 
जीते जाने की उम्मीदों की, 
सँवलाई-सी धूप सेंकते हैं 
गलियों-सड़कों की धुँधली पहचान लिए 
अब तक लगी न ऐसी एक थकान लिए 
थक जाने के डर ही से अक्सर 
हाथ टेकते, पाँव टेकते हैं। 

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।