Pratidin Ek Kavita

बर्फ़ , समंदर और ग्लेशियर - सूर्यबाला
 
सांसें पहाड़-सी टूटी पड़ रही हैं मुझ पर-
और मैं नदी सी बिछलती
धाराधार बहती जा रही हूँ
अपने ओर-छोर की नियति से बेखबर
आकांक्षाहीन...
समंदर हो जाने की
या बर्फ बन जम जाने की
कुछ भी हो सकता है
लेकिन
बहुत सालों बाद
जब टूटेंगे ग्लेशियर
बहेंगे महानद
तब क्या कोई समझेगा?
कि, कभी यह महानद-
मात्र बरूनियों पर उलझी
एक बूंद हुआ करती था!..
 

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।