पंख दिए आकाश न दोगे | कन्हैयालाल सेठिया पंख दिए, आकाश न दोगे? तो जड़ता चेतनता क्या है? फिर क्षमता-दर्बलता क्या है? केवल खेल, अगर रचना को- प्राण दिए, विश्वास न दोगे! व्यर्थ मृत्यु-जीवन की रेखा, निष्फल है कटु-मधु का लेखा, केवल कपट, अगर कोयल को- कंठ दिए, मधुमास न दोगे! हृदय-हीन की भाषा कैसी? मिलन-हीन अभिलाषा कैसी? कैवल व्यंग्य, अगर लोचन को- स्वप्न दिए, आभास न दोगे? पंख दिए, आकाश न दोगे?