हारमोनियम की दुकान से । कुमार अम्बुज उस पुरानी-सी दुकान पर ग्राहक कोई नहीं था बस एक बूढ़ा आदमी चुपचाप झुका हुआ एक हारमोनियम पर इतना तन्मय और बाकी चीज़ों से इतना बेखबर कि जैसे वह उस हारमोनियम का ही कोई हिस्सा वह बार-बार दबा रहा था एक रीड को शायद उसकी स्प्रंग ठीक नहीं थी धम्मन चलाते हुए उसने कई बार उस रीड को दबाया एक हलका-सा सुर गूँजता था उस भीड़ भरे बाज़ार में जो दस क़दम की दूरी तय करते-करते तोड़ देता था दम गज़ब कोलाहल के बीच एक मद्धिम सुर को साध रहा था वह बूढ़ा वह चिंतित था कि ठीक तरह से निकले वह सुर वह इस तरह से सुनता था उस मद्धिम सुर को जैसे इस समय की एक सबसे ज़रूरी आवाज़ मुझे याद अ रहे थे वे सारे गीत जिनमें बजता रहा हारमोनियम और बचपन की भजन संध्याएँ जिनमें हारमोनियम बजाते थे ताऊ तो रुक जाता था पूर्णमासी का चाँद अचानक खुश हुआ वह बूढ़ा और तनिक सीधे होते हए धम्मन चलाकर उसने दबाई वही रीड जिसे सुधार रहा था वह बहुत देर से