Pratidin Ek Kavita

आत्मा के गर्भ में -  नंदकिशोर आचार्य

चारों खूँट फैला
तप रहा मरूथल
आवें की तरह भीतर ही भीतर
क्या पकाता है ?
बोलो, तुम्हीं कुछ बोलो,
प्रजापति !
मेरी आत्मा के गर्भ में
क्या धर दिया पकने
मेरे ही पसार के चाक पर घड़ कर ?
ये आवाँ कभी तो खोलो,
प्रजापति !
मुझ में कभी तो हो लो !

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।