Pratidin Ek Kavita

टुकड़े टुकड़े दिन बीता | मीना कुमारी नाज़

टुकड़े टुकड़े दिन बीता 
धज्जी धज्जी रात मिली 
जिस का जितना आँचल था 
उतनी ही सौग़ात मिली 
रिम-झिम रिम-झिम बूंदों में 
ज़हर भी है अमृत भी है 
आँखें हँस दीं दिल रोया 
ये अच्छी बरसात मिली 
जब चाहा दिल को समझें 
हँसने की आवाज़ सुनी 
जैसे कोई कहता हो 
ले फिर तुझ को मात मिली 
मातें कैसी घातें क्या 
चलते रहना आठ पहर 
दिल सा साथी जब पाया 
बेचैनी भी साथ मिली 
होंटों तक आते आते 
जाने कितने रूप भरे 
जलती बुझती आँखों में 
सादा सी जो बात मिली

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।