जीवन की जय। मैथिलीशरण गुप्त मृषा मृत्यु का भय है, जीवन की ही जय है। जीवन ही जड़ जमा रहा है, निज नव वैभव कमा रहा है, पिता-पुत्र में समा रहा है, यह आत्मा अक्षय है, जीवन की ही जय है! नया जन्म ही जग पाता है, मरण मूढ़-सा रह जाता है, एक बीज सौ उपजाता है, स्रष्टा बड़ा सदय है, जीवन की ही जय है। जीवन पर सौ बार मरूँ मैं, क्या इस धन को गाड़ धरूँ मैं, यदि न उचित उपयोग करूँ मैं, तो फिर महा प्रलय है, जीवन की ही जय है।