Pratidin Ek Kavita

बेवक़्त गुज़र गया माली | डॉ श्यौराज सिंह 'बेचैन' 

टूटी डार झड़ी सब पत्तियाँ 
डाल भय लाचार 
विधाता कैसी विपदा डारी रे 
माँगत फूल, हवा और पानी 
ऋतु निर्मोही ने का ठानी 
काते कहें कौन दुख बाटें
कौन करे रखवाली 
बे वक्त गुज़र गया माली

किल्ला नए वक्त के मारे
आँधु लु ने निवल कर डाले
का खाएँ, का पिएँ बेचारे
कैसे कर के जीएँ बेचारे
नंगे सिर पर बरसी ज्वाला
घर आए कंगाली रे
बेवक़्त गुज़र गया माली

उठ गई पैंठ लदे व्यापारी
लुट गई, बिक गई रौनक़ सारी
शब्द से संदेश रह गए
खुद अपने दुख-दर्द मिटाना
खुद करना रखवाली रे
बेवक़्त गुज़र गया माली रे!

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।