Pratidin Ek Kavita

गुस्सा | ममता कालिया

उसने हैरानी से मुझे देखा
'मैं तो मज़ाक कर रहा था
तुम इतनी नाराज़ क्यों हो गयीं ?'

मैं उसे कैसे बताती
यह गुस्सा आज और अभी का नहीं
इसमें बहुत सा पुराना गुस्सा भी शामिल है
एक सन तिरासी का एक तिरानवे का
एक दो हज़ार दो का
और एक यह आज का

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।