शाश्वत । दूधनाथ सिंह यह उदासी जन्म से ही है। यह सहज, संभाव्य अकुलाहट मौन में यह दबी घबराहट यह तुम्हारा अंतरिक्ष-अभाव-तट कौन जानेगा कि यह जो बादलों में टँका मेरा हठ— तुम्हारे लिए—यह सच जन्म से ही है। और कोई एक भाषा-विपद और कोई एक कवि-पद और कोई एक हाहाकार और कोई तुम—सतत... कुछ भी हो— सभी कुछ है बराबर... सभी कुछ है व्यर्थ सभी कुछ है साधु... लेकिन यह तुम्हारा अंतरिक्ष-अभाव तट यह उदासी-भरा हठ—यह जन्म से ही है।