Pratidin Ek Kavita

चीटियां - गगन गिल 

चींटियाँ अपने घर का रास्ता भूल गई थीं। 
हमारी नींद और हमारी देह की बीच वे क़तार बनाती चलतीं। उनकी स्मृति में 
बिखरा रहता उनका अदृश्य आटा, जो किसी दूसरे देश-काल ने बिखेरा था। उसे 
ढूँढ़ती वे चलती जातीं पृथ्वी के एक सिरे से दूसरे की ओर। वे अपने दाँत गड़ातीं 
हर जीवित व मृत वस्तु में। उनके चलने से पृथ्वी के दुख हल्के होने लगते 
कि दिशाएँ घूमने लगतीं, भ्रमित हो। ध्रुव बदलने लगते अपनी जगह। चींटियों 
का दुख लेकिन कोई न जानता था। 
बहुत पहले शायद कभी वे स्त्रियाँ रही हों। 

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।