Pratidin Ek Kavita

उषा | शमशेर बहादुर सिंह | आरती जैन

प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे 
भोर का नभ 
राख से लीपा हुआ चौका 
[अभी गीला पड़ा है] 
बहुत काली सिल ज़रा-से लाल केसर से 
कि जैसे धुल गई हो 
स्लेट पर या लाल खड़िया चाक 
मल दी हो किसी ने 
नील जल में या किसी की 
गौर झिलमिल देह 
जैसे हिल रही हो। 
और... 
जादू टूटता है इस उषा का अब 
सूर्योदय हो रहा है। 

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।