Pratidin Ek Kavita

वे लेते हुए प्रतिशोध– नंदकिशोर आचार्य 
 
शब्द मेरे मुखौटे हैं जिनमें अपने को छुपाता हूँ मैं
अपनी लिप्सा, महत्वाकांक्षा, मक्कारी, फ़रेब और घृणा, भय अब
कितनी मदद की है शब्दों ने मेरी
उनका धन्यवाद करता जब अपनी ओर मुड़ता हूँ
पाता हूँ बस खोखल, जिसको छुपाता ख़ुद मुखौटा बन गया हूँ मैं
बेचारे नहीं होते शब्द, वे लेते हैं प्रतिशोध
शब्दों को जैसा बरतते हो तुम, वे तुमको वैसा बरतते नहीं!

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।