Pratidin Ek Kavita

दोपहर का भोजन | कुमार विकल

दुःख
दुःख को सहना
कुछ मत कहना—
बहुत पुरानी बात है।
दुःख सहना, पर
सब कुछ कहना
यही समय की बात है।
दुःख को बना के एक कबूतर
बिल्ली को अर्पित कर देना
जीवन का अपमान है।
दुःख को आँख घूरकर देखो
अपने हथियारों को परखो
और समय आते ही उस पर
पूरी ताक़त संचय करके
ऐसा झड़पो
भीगी बिल्ली-सा वह भागे
तुम पीछे, वह आगे-आगे।
दुःख को कविता में रो देना
‘यह कविता की रात है’
दुःख से लड़कर कविता लिखना
गुरिल्ला शुरुआत है।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।