Pratidin Ek Kavita

माँ की आँखें | श्रीकांत वर्मा 

मेरी माँ की डबडब आँखें 
मुझे देखती हैं यों 
जलती फ़सलें, कटती शाखें। 
मेरी माँ की किसान आँखें! 

मेरी माँ की खोई आँखें 
मुझे देखती हैं यों 
शाम गिरे नगरों को 
फैलाकर पाँखें। 

मेरी माँ की उदास आँखें।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।