Pratidin Ek Kavita

इंतिज़ार | साहिर लुधियानवी 

चाँद मद्धम है आसमाँ चुप है 
नींद की गोद में जहाँ चुप है 

दूर वादी में दूधिया बादल 
झुक के पर्बत को प्यार करते हैं 
दिल में नाकाम हसरतें ले कर 
हम तिरा इंतिज़ार करते हैं 

इन बहारों के साए में आ जा 
फिर मोहब्बत जवाँ रहे न रहे 
ज़िंदगी तेरे ना-मुरादों पर 
कल तलक मेहरबाँ रहे न रहे! 

रोज़ की तरह आज भी तारे 
सुब्ह की गर्द में न खो जाएँ 
आ तिरे ग़म में जागती आँखें 
कम से कम एक रात सो जाएँ 

चाँद मद्धम है आसमाँ चुप है 
नींद की गोद में जहाँ चुप है

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।