Pratidin Ek Kavita

मेरे सपने बहुत नहीं हैं | गिरिजा कुमार माथुर

मेरे सपने बहुत नहीं हैं
छोटी-सी अपनी दुनिया हो,
दो उजले-उजले से कमरे
जगने को, सोने को,
मोती-सी हों चुनी किताबें
शीतल जल से भरे सुनहले प्यालों जैसी
ठण्डी खिड़की से बाहर धीरे हँसती हो
तितली-सी रंगीन बग़ीची

छोटा लॉन स्वीट-पी जैसा,
मौलसिरी की बिखरी छितरी छाँहों डूबा
हम हों, वे हों
काव्य और संगीत-सिन्धु में डूबे-डूबे
प्यार भरे पंछी से बैठे
नयनों से रस-नयन मिलाए,
हिल-मिलकर करते हों
मीठी-मीठी बातें…
उनकी लटें हमारे कन्धों पर मुख पर
उड़-उड़ जाती हों,
सुशर्म बोझ से दबे हुए झोंकों से हिलकर
अब न बहुत हैं सपने मेरे
मैं इस मंज़िल पर आकर
सब कुछ जीवन में भर पाया।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।