Pratidin Ek Kavita

नमस्कार, दो हजार चौंसठ - अनामिका

नमस्कार दो हजार चौंसठ! कैसे हो? इन दिनों कहां हो?

नमस्कार, पानी!

नमस्कार, पीपल के पत्तो, 
तुमको बरफ की शकल याद है न? 
दूर वहां उस पहाड़ की चोटी पर उसका घर था, 
कभी-कभी घाटी तक आती थी- मनिहारिन-सी अपनी टोकरी उठाए: दिन-भर कहानियां सुनाती थी परियों की! 
कैसे तुम भूल गए उसको? नमस्कार, नदियो! 
दुबली कितनी हो गई हो!
आंखों के नीचे पसर आए हैं साये! क्या स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता? स्वास्थ्य केन्द्र चल तो रहा है?
कैसा है पीपल का पेड़ और ढाबा? कई बरस पहले मुझे ट्रेन में एक लड़का मिला था, 
उसकी उन आंखों में इस पूरी दुनिया की बेहतरी का सपना था! 
क्या तुमने उसको कहीं देखा ? 
उसके ही नाम एक चिट्ठी है, 
एक शुभकामना सन्देश मंगल ग्रह का:

चाँद की मुहर उस पर है, 
आई है कोरियर से लेकिन पता है अधूरा,

मोबाइल नम्बर भी है आधा मिटा हुआ ! 
क्या मिट्टी कर लेगी इसको रिसीव उसकी तरफ से ?

आओ, अंगूठा लगाओ, मिट्टी रानी, नमस्कार!

अच्छा है- कम-से-कम तुम हो- पीछे-पीछे दूर तक मेरे-

उड़ती हुई !

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।