Pratidin Ek Kavita

घर पहुँचना - कुंवर नारायण

हम सब एक सीधी ट्रेन पकड़कर अपने-अपने घर पहुँचना चाहते

हम सब ट्रेनें बदलने की 
झंझटों से बचना चाहते

हम सब चाहते एक चरम यात्रा
और एक परम धाम

हम सोच लेते कि यात्राएँ दुखद हैं 
और घर उनसे मुक्ति

सचाई यूँ भी हो सकती है 
कि यात्रा एक अवसर हो 
और घर एक सम्भावना

ट्रेनें बदलना
विचार बदलने की तरह हो 
और हम जब जहाँ जिनके बीच हों वही हो
घर पहुँचना।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।