Pratidin Ek Kavita

कुत्ता | उदयन वाजपेई 
कुत्ता होने वाली मृत्यु पर रोता है। 
देर रात किसी गली से निकल कर किसी घर के दरवाज़े पर ठिठकती मृत्यु को देखकर 
पहले वह भौंकता है
फिर यह पाकर कि वह उसकी ओर ध्यान दिए बिना 
घर के भीतर जा रही है, 
वह रोना शुरू करता है
दरअसल उसका भौंकना ही पिघलकर रोने में तब्दील हो जाता है
उसका भौंकना उसका रोना ही है, झटकों में बाहर आता हुआ
कुत्ता रोए या भौंके, 
वह किसी 
आसन्न मृत्यु की ख़बर ही पहुँचाता है। 
दूसरे शब्दों में, 
कुत्ता न जाने कैसे यह जानता है 
कि जिस शहर या गली में वह 
इतनी शान से चल रहा है,
वह महज़ एक ख़्वाब है 
जिसे देखने वाला बस जागने को है।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।