Pratidin Ek Kavita

चलने के लिए | विनोद कुमार शुक्ल

चलने के लिए
जब खड़े हुए 
तो जूतों की जगह
पैरों में
सड़कें पहन ली 
एक नहीं दो नहीं बदल बदलकर 
हजारों सड़कें 
तंग ऊबड़ खाबड़
बहुत चौड़ी सड़कें।
खूब चलें
कि ज़िन्दगी के नजदीक आने को
बहुत मन होता है 
वाकई ! ज़िन्दगी से होती हुई
कोई सड़क जरूर जाती होगी-
मैं कोई ऐसा जूता बनवाना चाहता हूँ 
जो मेरे पैरों में ठीक-ठाक आए।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।