Pratidin Ek Kavita

दंगाइयों को घर की समझ नहीं होती | देवशंकर नवीन 

‘दंगाइयों को घर की समझ नहीं होती’
दंगाई नहीं जानते घर का मतलब
जानते तो न जलाते
न उजाड़ते बस्तियाँ
कोई सच्चा मनुष्य तो
देख तक नहीं सकता
किसी घर का जलना, उजड़ना
क्योंकि घर अकेले नहीं उजड़ता
उसके साथ-साथ उजड़ते हैं
मनुष्य, मनुष्य के सपने, सपनों का परिवेश
घर में रहकर सपना देख लेने वाला मनुष्य
असल में कभी घर से बाहर ही नहीं होता
उस घर से उसका शरीर भर जाता है बाहर
शरीर के साथ बाहर जाकर भी
वह तथ्यत: घर में ही रहता है
इसीलिए इनसान बार-बार लौटता है घर
अपने घर, मगर दंगाई नहीं जानते घर का मतलब
क्योंकि वह घर में नहीं, अपने अंदर के घर में रहता है
जहाँ सपने और अनुराग नहीं
लहलहाते रहते हैं द्रोह और दंगों की फसल

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।