Pratidin Ek Kavita

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ | दुष्यंत कुमार 
 
मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ,
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ।
 
एक जंगल है तेरी आँखों में,
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ।
 
तू किसी रेल-सी गुज़रती है,
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ।
 
हर तरफ़ एतराज़ होता है,
मैं अगर रोशनी में आता हूँ।
 
एक बाज़ू उखड़ गया जब से,
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ।
 
मैं तुझे भूलने की कोशिश में,
आज कितने क़रीब पाता हूँ।
 
कौन ये फ़ासला निभाएगा,
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ।
 
 

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।