आओ, जल-भरे बरतन में । रघुवीर सहाय आओ, जल-भरे बरतन में झाँकें साँस से पानी में डोल उठेंगी दोनों छायाएँ चौंककर हम अलग-अलग हो जाएँगे जैसे अब, तब भी न मिलाएँगे आँखें, आओ पैठी हुई शीतल जल में छाया साथ-साथ भीगे झुके हुए ऊपर दिल की धड़कन-सी काँपे करती हुई इंगित कभी हाँ के, कभी ना के आओ जल-भरे बरतन में झाँके