Pratidin Ek Kavita

बर्फ़ बाहर गिर रही है - नंदकिशोर आचार्य 

बर्फ़ बाहर गिर रही है, 
यह अलाव भी बुझ चला सा है
एक अधजली लकड़ी से मैं झाड़ता हूँ राख
बुझ रही लकड़ियों को नए क्रम में पुन: चुनता हूँ
फूँक से जगाता हूँ आग सोई हुई
एक धीमा ताप सब पर व्याप जाता है
मीठा और उदास, बर्फ़ बाहर गिर रही होगी।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।