आना | कैलाश मनहर आऊँगा बारिश से भीगे खेतों पर क्वार की धूप बनकर चमकता-सा.... आऊँगा थके हुए बदन की रगों में धारोष्ण दूध की तरह उफनता-सा.... आऊँगा रूठी हुई प्रेमिका की आँखों में मानभरी लालिमा लिए दमकता-सा.... आऊँगा अकेले बच्चे के पास नाचती हुई चिड़िया के परों में लचकता-सा.... आऊँगा मकई के दानों में बनकर मिठास, शरद के आसपास सूर्योदय के साथ चूमने को तुम्हारे खुरदरे हाथ ज़रूर ज़रूर आऊँगा, करना तुम -- इन्तज़ार....