Pratidin Ek Kavita

पीठ की खुजली - राजेश जोशी
 
अभी-अभी लौटा हूँ सारे काम-धाम निपटाकर 
रात का खाना खाकर 
अभी-अभी कपडे बदलकर घुसा हूँ 
होटल के बिस्तर में 
और रह-रहकर पीठ में खुजली हो रही है 
रह-रहकर आ रही है इस समय 
तुम्हारी याद 
काम आ सकती थी जनेऊ इस समय 
पर उसे तो बहुत पहले ही छोड़ आया 
पैतृक घर की खूँटी पर 
कोई बैलगाड़ी भी नहीं यहाँ कि जिसके पहिए से 
टिक कर खुजला हूँ अपनी पीठ 
जहाँ तक जा सकता है ले जाता हूँ 
खींचकर पीठ पर अपना हाथ 
लेकिन यह नामुराद खुजली हर बार 
और आगे खिसक जाती है मेरे हाथ की पहुँच से 
मेरे हाथ की हद के आगे से शुरू होती है 
तुम्हारी हथेली की याद 
याद ने भी क्या कारण खोजा है आने के लिए 
घर से इतनी दूर इस गुलाबी शहर में!

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।