रेशमी पटोला । अलका सिन्हा ख़ूबसूरत, चिरजीवी होता है रेशमी पटोला तार-तार बुना जाता है बार-बार बिंधा जाता है बाँधा जाता है कई-कई रंगों में रंगा जाता है रेशमी पटोला। मगर अब इक्का-दुक्का परिवार ही बचे हैं जो सहेजते हैं इतने प्यार और इतमीनान से रेशमी पटोला। लंबा समय लगता है इन्हें तैयार करने में जैसेकि आत्मीय स्पर्श से रेशा-रेशा खिलती हैं इंद्रधनुषी वितान रचाती रंगोली सजाती तितली-सी लड़कियाँ। आसान नहीं होता कई-कई गाँठों में बंधना और डूब जाना हरबार एक नए रंग में बदले जाने के लिए। कठिन होती है यह प्रक्रिया जिसमें पिछला रंग भी सहेजना होता है और होता है नए रंग में निखरना। कभी पिता के घर का रंग तो कभी ससुराल का कभी बेटी तो कभी बहू पत्नी कभी तो कभी माँ के रंग में संवरना। जन्म लेने से जन्म देने के चक्र को पूरा करने की यत्न में बार-बार बिंधती है बंधती है, खुलती है फिर-फिर बंधती है। इसलिए रेशमी पटोला-सी बेशकीमती होती हैं लड़कियाँ।