बस एक काम यही बार बार करता था । माधव कौशिक बस एक काम यही बार बार करता था भँवर के बीच से दरिया को पार करता था उसी की पीठ पर उभरे निशान ज़ख़्मों के जो हर लड़ाई में पीछे से वार करता था अजीब शख़्स था ख़ुद अलविदा कहा लेकिन हर एक शाम मेरा इंतिज़ार करता था सुना है वक़्त ने उस को बना दिया पत्थर जो रोज़ वक़्त को भी संगसार करता था हवा ने छीन लिया अब तो धूप का जादू नहीं तो पेड़ भी पत्तों से प्यार करता था