Pratidin Ek Kavita

वागर्थ | सुनीता जैन 

एक पके फल-सा 
रसमय शब्द 
खोजती रहती है 
रसना 
जो भले कुछ न कहे 
पर संवेद में 
पूरा उतर जाए 

एक थिरक लय की 
खोजती रहती हैं 
उँगलियाँ 
जो भले ही 
सुनाई न दे 
पर साँसों में 
ताल-सी 
बज जाए 

एक वागर्थ 
ढूँढ़ती रहती हैं 
आँखों की 
पुतलियाँ 
जो हथेलियों-सा 
कहने और सहने को 
संपुट 
कर जाए 

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।