Pratidin Ek Kavita

मेरा घर।  पूर्णिमा वर्मन

मैंने सुई से खोदी ज़मीन 
‘फुलकारियां’ उगाई दुपट्टों पर
मैंने दीवारों में रचे ‘ताख़’ दीवट वाले
मैंने दरवाज़ों को दी राह बंदनवार वाली

मैंने आग पर पकाया स्वाद
अंजुरी में भरा तालाब
मैंने कमरों को दी बुहार
मैंने नवजीवन को दी पुकार
मैंने सहेजा
उमरदराज़ों को उनकी अंतिम सांस तक
मैंने सुरों को भी छेड़ा बांस तक
मेरे पसीने से बहा यश का गान
पर
मेरे घर पर लिखा तुम्हरा नाम...!

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

मेरा घर। पूर्णिमा वर्मन

मैंने सुई से खोदी ज़मीन
‘फुलकारियां’ उगाई दुपट्टों पर
मैंने दीवारों में रचे ‘ताख़’ दीवट वाले
मैंने दरवाज़ों को दी राह बंदनवार वाली

मैंने आग पर पकाया स्वाद
अंजुरी में भरा तालाब
मैंने कमरों को दी बुहार
मैंने नवजीवन को दी पुकार
मैंने सहेजा
उमरदराज़ों को उनकी अंतिम सांस तक
मैंने सुरों को भी छेड़ा बांस तक
मेरे पसीने से बहा यश का गान
पर
मेरे घर पर लिखा तुम्हरा नाम...!