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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
प्यास | रामदरश मिश्र
खड़ा हूँ नदी के किनारे प्यासा-प्यासा
जल के पास होकर भी जल नहीं पी पा रहा हूँ
मैने पूछा-
"तुमने अपने पानी का यह क्या रूप बना दिया है नदी?”
नदी दर्द से मुस्कराई, बोली
"मैंने क्या किया है आदमी
यह तो तुम्हारी ही गंदगी है।
जो मुझमें झर-झर कर मुझे विषाक्त कर रही है
अब तो मैं भी अपना जल नहीं पी पाती
प्यासी-प्यासी बह रही हूँ ।"