कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
कर्बला। राजेश जोशी
पानी पियो तो याद करो प्यास इमाम हुसैन की!
पानी पियो तो शुक्रिया अदा करो बादलों का
नदियों, तालाबों और समुंदरों का
शुक्रिया अदा करो समुंदरों का
समुद्रों का पानी पीने के काम न आए तो भी!
पानी पियो तो शुक्रिया अदा करो कुम्हारों का
जिन्होंने बनाए पृथ्वी की तरह गोल मटके
और बहुत सुंदर सुराहियाँ जिनकी गरदनें
सुंदर स्त्रियों की तरह पतली और लंबी हैं!
पानी पियो तो सोचो।
काटी तो नहीं तुमने दूसरों की नहरें
किसी की प्यास के रास्ते में तुम यज़ीद तो नहीं?
पानी पियो तो याद करो उस शख़्स को
तपते रास्तों में जिसने दिया
गुड़ और पानी
जिसने रास्तों में बिठाईं ठंडे पानी की सबीलें
उसका शुक्रिया अदा करो!
उसका भी जिसने कम से कम इच्छा की
प्याऊ लगाने की!
पानी पियो तो सोचो
खारा तो नहीं हुआ है तुम्हारी आत्मा का जल
पानी पियो तो सोचो नन्हे अली असग़र के बारे में
सोचो कहीं अंधे तीर में तो नहीं बदल गई है
तुम्हारी घृणा!