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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
तुम्हारे बारे में | भवानी प्रसाद मिश्र
तुम्हारे बारे में,
तुमसे ही कहूँ
तुम्हें देखकर बढ़ जाती है
मशालों की ज्योति
मोती हो जाता है
ज़्यादा पानी दार
आभार-सा मानता हैं
हर प्रकाश का पुंज
कुंज ज़्यादा हरे हो जाते हैं
नदी-नद ज़्यादा भरे हो जाते हैं
वन हो पाते हैं उन्मन
पवन उतना चंचल नहीं रहता
सृष्टि का श्रम जिस दिन
मेरे हाथ में आयेगा
मैं हर जगह तुम्हें पेश कर दूँगा
सारे अविशेषों को
स्पर्श से तुम्हारे
सरासर सविशेष कर दूँगा !