Pratidin Ek Kavita

दुश्वारी। जावेद अख़्तर

मैं भूल जाऊँ तुम्हें
अब यही मुनासिब है

मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ
कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो

कोई ख़्वाब नहीं
यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ

कम-बख़्त
भुला न पाया वो सिलसिला

जो था ही नहीं
वो इक ख़याल

जो आवाज़ तक गया ही नहीं
वो एक बात

जो मैं कह नहीं सका तुम से
वो एक रब्त

जो हम में कभी रहा ही नहीं
मुझे है याद वो सब

जो कभी हुआ ही नहीं

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

दुश्वारी। जावेद अख़्तर

मैं भूल जाऊँ तुम्हें
अब यही मुनासिब है

मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ
कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो

कोई ख़्वाब नहीं
यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ

कम-बख़्त
भुला न पाया वो सिलसिला

जो था ही नहीं
वो इक ख़याल

जो आवाज़ तक गया ही नहीं
वो एक बात

जो मैं कह नहीं सका तुम से
वो एक रब्त

जो हम में कभी रहा ही नहीं
मुझे है याद वो सब

जो कभी हुआ ही नहीं