Pratidin Ek Kavita

कभी कभी यूँ भी हम ने । निदा फ़ाज़ली

कभी कभी यूँ भी हम ने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है

हम से पूछो इज़्ज़त वालों की इज़्ज़त का हाल कभी
हम ने भी इक शहर में रह कर थोड़ा नाम कमाया है

उस को भूले बरसों गुज़रे लेकिन आज न जाने क्यूँ
आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारन धमकाया है

उस बस्ती से छुट कर यूँ तो हर चेहरे को याद किया
जिस से थोड़ी सी अन-बन थी वो अक्सर याद आया है

कोई मिला तो हाथ मिलाया कहीं गए तो बातें कीं
घर से बाहर जब भी निकले दिन भर बोझ उठाया है

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

कभी कभी यूँ भी हम ने । निदा फ़ाज़ली

कभी कभी यूँ भी हम ने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है

हम से पूछो इज़्ज़त वालों की इज़्ज़त का हाल कभी
हम ने भी इक शहर में रह कर थोड़ा नाम कमाया है

उस को भूले बरसों गुज़रे लेकिन आज न जाने क्यूँ
आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारन धमकाया है

उस बस्ती से छुट कर यूँ तो हर चेहरे को याद किया
जिस से थोड़ी सी अन-बन थी वो अक्सर याद आया है

कोई मिला तो हाथ मिलाया कहीं गए तो बातें कीं
घर से बाहर जब भी निकले दिन भर बोझ उठाया है