Pratidin Ek Kavita

मैं दुनिया की हक़ीक़त जानता हूँ | नक़्श लायलपुरी

मैं दुनिया की हक़ीक़त जानता हूँ
किसे मिलती है शोहरत जानता हूँ

मिरी पहचान है शे'र-ओ-सुख़न से
मैं अपनी क़द्र-ओ-क़ीमत जानता हूँ

तेरी यादें हैं शब-बेदारियाँ हैं
है आँखों को शिकायत जानता हूँ

मैं रुस्वा हो गया हूँ शहर-भर में
मगर किस की बदौलत जानता हूँ

ग़ज़ल फूलों सी दिल सहराओं जैसा
मैं अहल-ए-फ़न की हालत जानता हूँ

तड़प कर और तड़पाएगी मुझ को
शब-ए-ग़म तेरी फ़ितरत जानता हूँ

सहर होने को है ऐसा लगे है
मैं सूरज की सियासत जानता हूँ

दिया है 'नक़्श' जो ग़म ज़िंदगी ने
उसे मैं अपनी दौलत जानता हूँ


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

मैं दुनिया की हक़ीक़त जानता हूँ | नक़्श लायलपुरी

मैं दुनिया की हक़ीक़त जानता हूँ
किसे मिलती है शोहरत जानता हूँ

मिरी पहचान है शे'र-ओ-सुख़न से
मैं अपनी क़द्र-ओ-क़ीमत जानता हूँ

तेरी यादें हैं शब-बेदारियाँ हैं
है आँखों को शिकायत जानता हूँ

मैं रुस्वा हो गया हूँ शहर-भर में
मगर किस की बदौलत जानता हूँ

ग़ज़ल फूलों सी दिल सहराओं जैसा
मैं अहल-ए-फ़न की हालत जानता हूँ

तड़प कर और तड़पाएगी मुझ को
शब-ए-ग़म तेरी फ़ितरत जानता हूँ

सहर होने को है ऐसा लगे है
मैं सूरज की सियासत जानता हूँ

दिया है 'नक़्श' जो ग़म ज़िंदगी ने
उसे मैं अपनी दौलत जानता हूँ