Pratidin Ek Kavita

लोग पगडंडियाँ बनाएँगें। लक्ष्मीशंकर वाजपेयी
 
रास्ते जब नज़र न आएँगे
लोग पगडंडियाँ बनाएँगे।

खुश न हो कर्ज़ के उजालों से
ये अँधेरे भी साथ लाएँगे।

ख़ौफ़ सारे ग्रहों पे है कि वहाँ
आदमी बस्तियाँ बसाएँगे।

सुनते-सुनते गुज़र गई सदियाँ
मुल्क़ से अब अँधेरे जाएँगे।

जीत डालेंगे सारी दुनिया को
वे जो अपने को जीत पाएँगे।

दूध बेशक पिलाएँ साँपों को
उनसे लेकिन ज़हर ही पाएँगे।


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

लोग पगडंडियाँ बनाएँगें। लक्ष्मीशंकर वाजपेयी

रास्ते जब नज़र न आएँगे
लोग पगडंडियाँ बनाएँगे।

खुश न हो कर्ज़ के उजालों से
ये अँधेरे भी साथ लाएँगे।

ख़ौफ़ सारे ग्रहों पे है कि वहाँ
आदमी बस्तियाँ बसाएँगे।

सुनते-सुनते गुज़र गई सदियाँ
मुल्क़ से अब अँधेरे जाएँगे।

जीत डालेंगे सारी दुनिया को
वे जो अपने को जीत पाएँगे।

दूध बेशक पिलाएँ साँपों को
उनसे लेकिन ज़हर ही पाएँगे।