Pratidin Ek Kavita

माँ । श्रीनरेश मेहता

मैं नहीं जानता
क्योंकि नहीं देखा है कभी—

पर, जो भी
जहाँ भी लीपता होता है

गोबर के घर-आँगन,
जो भी

जहाँ भी प्रतिदिन दुआरे बनाता होता है
आटे-कुंकुम से अल्पना,

जो भी
जहाँ भी लोहे की कड़ाही में छौंकता होता है

मेथी की भाजी,
जो भी

जहाँ भी चिंता भरी आँखें लिए निहारता होता है
दूर तक का पथ -

वही,
हाँ, वही है माँ!!

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

माँ । श्रीनरेश मेहता

मैं नहीं जानता
क्योंकि नहीं देखा है कभी—

पर, जो भी
जहाँ भी लीपता होता है

गोबर के घर-आँगन,
जो भी

जहाँ भी प्रतिदिन दुआरे बनाता होता है
आटे-कुंकुम से अल्पना,

जो भी
जहाँ भी लोहे की कड़ाही में छौंकता होता है

मेथी की भाजी,
जो भी

जहाँ भी चिंता भरी आँखें लिए निहारता होता है
दूर तक का पथ -

वही,
हाँ, वही है माँ!!