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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
बड़ी-बी। अनिरुद्ध उमट
बड़ी-बी दरवाज़ा खोलो
तुम्हारी पान
घुँघरू, ख़त लाने में हुई मुझसे देरी बहुत
'हम नहीं जानते तुम कौन हो'
बड़ी-बी हाथ में ख़त लिए
मुँह में पान चबाए
छमछम करती दरवाज़े की दहलीज़ पर आ
हैरान थी
'हमने अपने मरने का दिन तय कर रखा था
हमने समझा वह आ गया है'
कहती बड़ी-बी मेरी आँखों में झाँक रही थी
'ठीक है गड्ढा ठीक ही खुदा है'
कहती वह उतरी और एक मुट्ठी मिट्टी
हमें दे गई