Pratidin Ek Kavita

माँ अतिथि है | कुमार अम्बुज

माँ घर में आई है लेकिन वह अतिथि है
उसके पास उसके हज़ारों बाक़ी रह गए काम हैं

उसके पास उसका अपना घर है
जिसे लंबे समय तक नहीं छोड़ा जा सकता सूना

जो भरा हुआ है बीते हुए समय से
माँ धीरे-धीरे चली गई है इतनी दूर

कि उसके सबसे स्मरणीय और चमकदार रूप के लिए
लौटना होता है कई साल पहले के वक़्त में

मैं चाहूँ तो भी नहीं रोक सकता माँ को जाने से
भूल चुका हूँ मैं हठ करना

दूर-दूर तक नहीं बची रह गई है मुझमें अबोधता
धीरे-धीरे मैं ख़ुद चला आया हूँ माँ से इतनी दूर

कि मेरे घर में अब
माँ एक अतिथि है।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

माँ अतिथि है | कुमार अम्बुज

माँ घर में आई है लेकिन वह अतिथि है
उसके पास उसके हज़ारों बाक़ी रह गए काम हैं

उसके पास उसका अपना घर है
जिसे लंबे समय तक नहीं छोड़ा जा सकता सूना

जो भरा हुआ है बीते हुए समय से
माँ धीरे-धीरे चली गई है इतनी दूर

कि उसके सबसे स्मरणीय और चमकदार रूप के लिए
लौटना होता है कई साल पहले के वक़्त में

मैं चाहूँ तो भी नहीं रोक सकता माँ को जाने से
भूल चुका हूँ मैं हठ करना

दूर-दूर तक नहीं बची रह गई है मुझमें अबोधता
धीरे-धीरे मैं ख़ुद चला आया हूँ माँ से इतनी दूर

कि मेरे घर में अब
माँ एक अतिथि है।