कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।
सम्बन्धों के ठंडे घर में | अमरनाथ श्रीवास्तव
सम्बन्धों के ठंडे घर में
वैसे तो सबकुछ है लेकिन
इतने नीचे तापमान पर
रक्तचाप बेहद खलता है|
दिनचर्या कोरी दिनचर्या
घटनायें कोरी घटनायें
पढ़ा हुआ अखबार उठाकर
हम कब तक बेबस दुहरायें
नाम मात्र को सुबह हुई है
कहने भर को दिन ढलता है|
सहित ताप अनुकूलित घर में
मौसम के प्रतिमान ढूंढते
आधी उमर गुजर जाती है
प्याले में तूफान ढूंढते
गर्म खून वाला तेवर भी
अब तो सिर्फ हाथ मलता है|
सजे हुए दस्तरख्वानों पर
मरी भूख के ताने -बाने
ठहरे हुए समय सी टेबुल
टिकी हुई बासी मुस्कानें
शिष्टाचार डरे नौकर सा
अक्सर दबे पांव चलता है|