Pratidin Ek Kavita

बाँस | कन्हैयालाल सेठिया

स्वयं उगते
नहीं उगाए जाते
बाँस,
नहीं होते
उनके सुमन
कोई फल
नहीं उनमें
चंदन की सुवास,
पर बिना बाँस
नहीं बनती बाँसुरी,
ध्वनित होती है
जिसके छिद्रों से
राग रागिनियाँ
बिना उसके
नहीं बनती कलम
जिससे व्यक्त होती हैं
जीवन की अनुभूतियाँ
जो हैं अनमोल
वह बिकते हैं 
कौड़ियाँ के मोल

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

बाँस | कन्हैयालाल सेठिया

स्वयं उगते
नहीं उगाए जाते
बाँस,
नहीं होते
उनके सुमन
कोई फल
नहीं उनमें
चंदन की सुवास,
पर बिना बाँस
नहीं बनती बाँसुरी,
ध्वनित होती है
जिसके छिद्रों से
राग रागिनियाँ
बिना उसके
नहीं बनती कलम
जिससे व्यक्त होती हैं
जीवन की अनुभूतियाँ
जो हैं अनमोल
वह बिकते हैं
कौड़ियाँ के मोल